रवी ज़करिया दोष निकालनेवालों को जवाब देते हैं – प्रोग्राम 1

रवी ज़करिया दोष निकालनेवालों को जवाब देते हैं – प्रोग्राम 1

 

आज द जॉन एन्करबर्ग शो में डॉक्टर रवी जकर्याह दोष निकालनेवालों को जवाब देते हैं/

रवी भारत में पले-बढ़े, जहाँ इनके पूर्वज याजकों में ऊँची जाती के थे, लेकिन एक दिन इन्होने यीशु मसीह के वचनों को सुना और विश्वासी बन गए, और अब ये संसार में सबसे बुद्धिमान मसीही अपोलोजिस्ट हैं, 70 से भी ज्यादा देशों में यात्रा की हैं, और बहुत सम्मानित यूनिवर्सिटीज में वक्ता रहे हैं,जिन में हैं, हारवर्ड, प्रिंस्टन, डार्टमाउथ, जॉनस होपकिन्स और ओक्स्वार्ड यूनिवर्सिटी में भी/ ये दक्षिण अफ्रीका में पीस अकॉर्ड को भी संदेश देते हैं, और मिलटरी अफसरों को भी लेनन मिलटरी अकैडमी में, सेंटर फॉर जिओपोलिटिकल स्ट्रेटजी मास्को में/

तीन बार इन्हें न्युयोर्क में युनायटेड नेशन के एन्युअल प्रेअर ब्रेकफास्ट मीटिंग में बुलाया गया/ और इन्होने नेशनल प्रेअर ब्रेकफास्ट में सिट ऑफ गवरमेंट ओटावा, केनडा में भी संदेश दिया है, और लन्दन इंग्लैंड में, और सी आय ए वाशिंगटन डी सी में भी वक्ता रहे हैं, आज हमारे साथ जुड़ जाए विशेष प्रोग्राम द जॉन एन्करबर्ग शो में/

 

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डॉक्टर जॉन एन्करबर्ग:  प्रोग्राम में स्वागत है, मैं हूँ जॉन एन्करबर्ग, हमारे साथ जुड़ने के लिए धन्यवाद, शायद आपके किसी दोस्त ने आपको फोन कर बताया होगा कि आज हमारा प्रोग्राम देखे, और हमारे अद्भुत मेहमान की सुने, यदि ऐसा है तो मैं बता दूँ कि आप निराश नही होगे/ मेरे मेहमान हैं बुद्धिमान मसीही अपोलोजिस्ट, रवी जकर्याह, ये पुरे संसार में 70 से भी ज्यादा देशो में यात्रा कर चुके हैं, और सबसे सम्मानित यूनिवर्सिटी में वक्ता रहे हैं, विद्यार्थियों के जीवन कई मुश्किल सवालों का जवाब देते आएं  हैं, और ये व्यवहारिक रूप में और बड़े प्रेम से इसे करते हैं/

साथ ही ये वक्ता हैं, सरकारी लीडर के सामने संसार के दुसरे भागों में, और तीन बार इन्होने युनायटेड नेशन्स न्युयोर्क में वक्ता रहे हैं, एनुअल प्रेअर ब्रेकफास्ट में, जो हर साल यूएन जनरल असेम्बली में हर साल शुरू में होता है/ और ये प्रसारण दोस्तों, 206 देश और प्रान्तों में देखा जाएगा/ और ये बहुतसी भाषाओँ में अनुवाद किया जाएगा, और आनेवाले हफ्तों में मैंने रवी से कहा है, कि विद्यार्थियों के सवालों का जवाब दे, सबसे पहले हम पूर्व के लोगों के साथ एक हप्ता बिताएगे, और फिर हम मध्य-पूर्व में आएगे, और फिर यूरोप के लोगों के लिए एक हफ्ता होगा, और फिर अमेरिका के विद्यार्थियों से, तो मैं सोचता हूँ कि आप इसका आनन्द उठाएगे/

लेकिन आज मैं चाहता हूँ कि आप इस भाई को जान ले, इनका जन्मे चेन्नाई भारत में हुआ/ और रवी हमारा संसार गडबडी में है, लोग जवाब ढूड रहे हैं, और लगता है कि इन्हें कुछ महत्वपूर्ण बात नही मिलती है/ और आप खुद गडबडी में पड़े हुए नौजवान थे, हमें चेन्नाई में वापस ले जाइए/ और आप यीशु मसीह की स्पष्ट शिक्षा को नही जानते थे, ये सब कैसे हुआ कि आप विश्वासी बने और यीशु के पीछे चलने लगे?

डॉक्टर रवि जकर्याह:  þ खैर सबसे पहले आपके साथ मिलकर ख़ुशी हुई जॉन, आपको कई साल से जानता हूँ और हमारी दोस्ती से बहुत खुश हूँ/ जी, हाँ आप सही हैं, मैं सोचता हूँ कि गडबडी तो शायद निश्चित है आज के संसार में और ये किसी खास परंपरा के लिए नही है/ चाहे मैं जहाँ भी जाऊं, सच में, हमारे दर्शकों का ज्यादा भाग तो सच में जवानों के बिच में है / चाहे ये यूनिवर्सिटी हो, या हाय स्कुल हो चाहे जो भी हो,  ये जीवन में सवाल पूछनेवाला स्थर होता है/ और एक चायनीज़ नीतिवचन है जो कहता है, यदि आप जानना चाहते हैं कि पानी क्या है, तो मछली से न पूछना/ जब आप किसी बात में इतने डूब जाते हैं, तो अकसर आप किसी दुसरे दृष्टिकोण के बारे में सोचते भी नही/ आप इस पर सवाल पूछना नही चाहते हैं कि आपका वातावरण किस बारे में है/ लेकिन दिलचस्प बात तो ये है कि शायद आप किसी बात में बाहरी रूप में डूबे हो, लेकिन भीतर में आप उससे भाग नही सकते जो आपका पीछा कर रहा है/

याने हाँ आप सही हैं, चेन्नाई, भारत में मैं पैदा हुआ हूँ, जो उस समय मद्रास कहा जाता था, लेकिन कुछ साल पहले उसे बदलकर चेन्नाई रखा गया, बॉम्बे बदलकर मुम्बई रखा गया/ मुझे ये सब याद रखना पड़ता है/ उस दक्षिणी शहर में मेरी परवरिश हुई, मेरी माँ चेन्नाई में ही पैदा हुई और बड़ी हुई थी/ मेरे पिताजी दक्षिण भारत से आए थे, केरला के राज्य से/ उनकी मुलाकात चेन्नाई में हुई और वही शादी हुई/ याने मेरे पिताजी मलयालम बोलते थे, मां तमील बोलती थी, मेरी परवरिश दिल्ली में हुई, और हिंदी में बोलता था, मैं अकसर कहता हूँ कि मैं हिन्दी और तमील बोल सकता हूँ, मलियालम में मुझे केवल पिताजी ने उपयोग किए डांट के शब्द याद है, तो मैं लोगों के सामने उसे नही कहता/ चेन्नाई में मैं रहता था, जब छोटा था, 3-4 साल कि उम्र तक फिर दिल्ली में आ गए/

लेकिन बात तो ये है जॉन, लोग ये नही जानते हैं कि भारत संसार में सबसे ज्यादा गावों का देश है/ लोग जवाब ढूड रहे हैं, विधियों के द्वारा/ परंपरा के ऐतिहासिक रिवाजों के द्वारा/ और ये सब आस्था के साथ आता है/ तकनीकी रूप में कहे तो अविश्वासी विद्वान् कहेगे कि 33 करोड़ देवी और देवता हैं हिन्दू आस्था के अनुसार, अब केवल कुछ लोग ही बड़ी इमानदारी से इसका पालन कर रहे हैं, भारत के लोगों में, लेकिन इस परंपरा में, पूर्वजों की अच्छी पीढ़ी का इतिहास होने के कारण जो हिन्दू पंडितों की ऊँची जाती से थे, जो कि नंबूदरी थे, मेरे पिताजी केरला से थे, मेरी माँ चेन्नाई से थी, जैसे मैंने कहा है, लेकिन मैंने धार्मिक बातों के बारे में कभी गंभीरता से नही सोचा, क्यों? क्योंकि पढाई के क्षेत्र में मुझे अच्छे से कर दिखने के लिए ज़ोर दिया गया, भारत पढाई में बहुत स्पर्धा की परंपरा का देश है, यदि हम अच्छी पढाई नही करते हैं,  तो कुछ नही कर पाएगे, याने हर तरफ से दबाव होता है/

डॉक्टर जॉन एन्करबर्ग:  वहां विद्यार्थियों पर बहुत दबाव होता है/

डॉक्टर रवि जकर्याह:  þ जी, और केवल पास होने के लिए काफी नही, ज्यादा अंक कमाने थे, लिस्ट में उपर रहना था, और मैं ये नही कर रहा था,  क्रिकेट मेरे खून में था, मैं क्रिकेट और टेनिस खेलता था, मुझे स्पोर्ट्स फील्ड पसंद था, पढाई के भाग से नफरत करता था, और फिर अंत में मेरे पिताजी के साथ मैं बड़ी परेशानी में फंस गया, मैं वो नही कर पा रहा था और उसे पाने की कोशीश करने और स्वीकृति की जरूरत के बारे में, भारत के बारे मे एक और बात, ये शर्म पर चलनेवाली परंपरा है, यदि अच्छी पढाई नही करते हैं, तो सफल होने की कोशीश में शर्मिंदा होते हैं, भारत में आत्महत्या करने का सबसे ज्यादा रेट तो तब होता है अख़बारों में परीक्षा के रिजल्ट्स दिए जाते हैं, पुरे देश में, बच्चे बिल्डिंग से कूदते हैं, खुद पर कैरोसिन डालते हैं, और खुद को जलाते हैं, यहाँ तक कि मेरे करीबी दोस्त ने भी खुद के साथ ऐसे किया/ याने ये इस तरह की परंपरा थी जिसमें मैं जन्मा, बढ़ा और लड़ता रहा, मेरे भाई और बहन अच्छे पढ़ रहे थे, और मैं नही, मैं परिवार में असफल व्यक्ति था/ और अंत में इसी ने मुझे पकड़ लिया/

डॉक्टर जॉन एन्करबर्ग:  जी, मैं मुंबई में गया हूँ, अब कोलकाता जा रहा हूँ, और मैं देखता हूँ कि लोग, जिस किसी आस्था के पीछे चलते हैं, उसे बहुत इमानदारी से मानते हैं/ याने वो ईमानदार हैं, लेकिन फिर भी गडबडी में हैं, उनके पास अभी भी जवाब नही हैं, वो खोज रहे हैं, इसके बारे में कुछ बताइए/

डॉक्टर रवि जकर्याह:  þ जी, भारत में मुख्य धर्म हैं, हिन्दुइज्म, इस्लाम, बुद्धीज्म, सीखइज्म, जैनिजम, और कुछ लोग हैं बहायइज़म से/ और मसीहियत तो इसमें बहुत कम प्रतिशत में हैं/ और लोग अकसर सोचते हैं कि मसीहियत तो कुछ खास लोगों का बढ़ा हुआ दृष्टिकोण है, नही, नही, ये सच है कि सब बढ़े हुए दृष्टिकोण के हैं, कोई भी बढ़े दृष्टिकोण के बिना नही हैं, नही तो वो नही बनते/ वो एक उद्देश के लिए बनाए गए हैं, केवल कुछ को छोडकर, और जवाब की खोज में, मैं तो चाहे जो भी उस में गया, और खालीपन और अकेलापन, और स्कुल की असफलता, देखिए ये सब, मेरे एक भी मसीही दोस्त नही थे, वो सब तो, ज्यादातर लोग हिन्दू दृष्टिकोण के थे, जो परिवार के लिए बहुत आदर की जिम्मेदारी रखता है, और ये सब, मेरी परवरिश इसी तरह हुई/ लेकिन खालीपन भीतर आया, बिना जवाब के/ केवल सवाल थे, परंपरा, परंपरा, परंपरा, इसे मानना ही होगा, मैं जानता था कि ये मुझे कही नही ले जाएगा/ और अंत में मैनें आत्महत्या करने की कोशीश की/

डॉक्टर जॉन एन्करबर्ग:  जी, इसके बारे में बताइए, आपने इसे कैसे किया?

डॉक्टर रवि जकर्याह: खैर कई साल तक इसे नही कर पाया, जॉन, सच कहता हूँ/ जब तक मेरे पिताजी, पिताजी और माँ जिन्दा थे, ये उनके लिए बहुत शर्म की बात थी, फिर मेरे पिताजी के अंतिम साल में, पूरी तरह शून्य हो गया, उन्होंने मेरी पत्नी से इसके बारे में कहने के लिए कहा और फिर उन्होंने बात की/ और ये तो फिर से शर्म की बात थी, कोई मानना नही चाहता कि कहे कि कितने निचे गए थे, दर्शकों को बताना चाहता हूँ कि इसका मनोवैज्ञानिक अयोग्यता से संबंध नही था, और ड्रग्स और इस तरह की दूसरी बातों का मुद्दा नही था, ये केवल अर्थ की खोज करना था, मैं जीवन को एक साथ रखना चाहता था, और ये मेरे लिए एक साथ नही आ रही थी/

तो मैं कॉलेज में अपनी क्लास में गया, और वहां पर साइन्स लैब में गया, कुछ कमिकल्स देखे, साथ में ये प्लास्टिक बैग्स लिए, मुझे पता नही था कि क्या कहा गया है, केवल वो नही लिया जिस पर लिखा था ज़हर/ उसे साथ में घर लेकर आया, पानी के ग्लास में डाला, एक दिन सुबह की बात है, सब लोग घर से बाहर थे, रेस्ट रूम में गया उसे हिलाया, वो तुरंत ही घुलने लगा, प्रभावी रूप में, मैंने टी स्पून से उसे घुमाया, और उसे निगल लिया/

मैं शुरू के दिनों में अपनी कहानी ये कहते हुए बताता था, दुर्भाग्यवश, लेकिन एक बार डॉक्टर ने मुझे सही किया, कि आप सौभाग्य से इसे कहना शुरू कीजिए, वो बहुत नमकीन था, और मेरा सिस्टम उसका इनकार करने लगा, तब मैं सिंक को पकड़े हुए था, पूरी तरह पसीना पसीना हो गया था, मैं अपने घुटनों पर गिर गया,मदत के लिए ज़ोर से चिल्लाया/ घर की नौकर ने मुझे चिल्लाते हुए सुना, घर में और कोई नही था, वो आए, मुझे पता नही कि दरवाज़ा तोड़ दिया या उसे धक्का मारकर गिरा दिया, मुझे पूरी तरह से याद नही/ लेकिन उसने मुझे उस दयनीय दशा में देखा/ मुझे टैक्सी में बैठाकर हॉस्पिटल ले गए/ और जब मैं पूरी तरह से होश में आया, मुझे इतना ही पता है कि मेरे हाथों में सुईयां थी, डीहायड्रेशन के कारण/ मेरे माता-पिता मेरी बगले में ही थे, वो पूरी तरह निराश थे कि तुम्हें पता नही कि किस तरह से जीए/ अब तुम्हें मरना भी नही आता है/ वो तो मेरे लिए चौराहे की जगह का पल था, कि जो सवाल मैं पूछ रहा था उसे गंभीरता से पूछता चला जाऊं/

डॉक्टर जॉन एन्करबर्ग:  एक मनुष्य आपके कमरे में आएं और क्या किया?

डॉक्टर रवि जकर्याह:þ खैर ये मेरे लिए अद्भुत बात है, इसलिए मैं आलौकिक मुलाकात पर विश्वास करता हूँ, मैं किसी के आने की राह नही देख रहा था, सच में, मुझे पता नही कि उन्हें इस तरह क्यों आने दिया/ शायद इसलिए कि उन्होंने कहा था कि वो सेवक हैं/ और वो एक छोटा लाल नया नियम लाए थे, और मेरे लिए उसे पढना  चाहते थे और मेरी माँ ने कहा, वो नही कर पाए, मैं बुरी दशा में था, तो उन्होंने युहन्ना का 14 वा अध्याय निकाला/ और वहां अद्भुत रूप में यीशु थोमा से कह रहा था,पहला व्यक्ति जो भारत में सुसमाचार लेकर आया, और वो नम्बूदरी लोगों तक पहुंच रहे थे, मैं बता दूँ/ मेरे ही पूर्वज जो सदियों पहले थे/

और युहन्ना के उस 14 वे अध्याय में, जैसे यीशु कह रहा था, क्योंकि मैं जीवित हूँ तुम भी जीवित रहोगे/ मैंने उस वचन को पकड़ लिया/ और कहा यीशु यदि तू मुझे वो जीवन दे रहा है जो मैंने कभी नही पाया था, मुझे तुझ से वो जीवन चाहिए/ वो मेरे लिए बदलाव की जगह थी, मैंने सच में कोई अर्थपूर्ण प्रार्थना नही की/ और मैंने यीशु मसीह को न्योता दिया, जीवन का कर्ता, कि मुझे वो जीवन दे जो केवल वो दे सकता था, 17 साल की उम्र में, और मेरी माँ को बाइबल दी गई, मैं उसे नही पकड़ पाया जैसे मैने बताया था कि डीहायड्रेशन हुआ था/ तो मेरी माँ ने अपनी भारी आवाज़ में, मेरे लिए इसे पढ़ा, मैंने प्रार्थना की, और वो इस यात्रा की शुरुवात थी जो अभी भी जारी है, जो पूरी ख़ुशी और सच्चाई से भरी है/ जी, मोड़ और घुमाव, उतार चढाव आएं, लेकिन जब परमेश्वर का नक्शा हमारे मन में होता है, आप उसके साथ हाथ मिलाकर चलते हैं/

डॉक्टर जॉन एन्करबर्ग:  मेरे मेहमान हैं, रवी जकर्याह, विद्वान मसीही अपोलोजिस्ट, जिन्होंने मेरे पहचान के सभी लोगों में सबसे ज्यादा यूनिवर्सिटी कैम्पस में संदेश दिया है/ और आपको होर्वर्ड में आने के लिए कहा था, और बहुत ही मुश्किल सवालों पर लेक्चर देने के लिए कहा गया था, क्या मनुष्य परमेश्वर के बिना जी सकता है? और उन लेक्चर से एक किताब बनी, लेकिन मुझे वापस ले जाए और सवाल का जवाब दीजिए/ क्या मनुष्य परमेश्वर के बिना जी सकता है /

डॉक्टर रवि जकर्याह:þ जी, ये मेरे लिए बहुत ही याद रखनेवाला समय था, जॉन, 90 की शुरवात में जब पहला वेराटास फोरम किया गया/ अब वो पुरे देश में इसे करते हैं, अलग यूनिवर्सिटीज में, और मुझे विषय दिया गया था, क्या मनुष्य परमेश्वर के विना जी सकता है/ विल डोरान्ट के कोटेशन से, उन्होंने कहा था कि हमारे समय का सबसे महान सवाल है वो तो उत्तर के विरुद्ध में दक्षिण जाना नही है, या पूर्व से पश्चिम में, कम्युनिज्म से कैपिटलिज्म में, लेकिन हमारे समय का सबसे महान सवाल होगा कि क्या मनुष्य परमेश्वर के बिना जी सकता है? और मैंने इन्ही आखरी शब्दों को लिया और मेरे लेक्चर का शीर्षक दिया, मैंने वहां दो लेक्चर दिए, जिसे बहुत से समूह ने स्पोंसर किया था, फिलोसोफिकल सोयायटी,मसीही ग्रुप्स और दुसरे लोग, और जगह थी होर्वर्ड लॉ स्कुल/ और मुझे इसके बारे में दो बातें बहुत ही स्पष्ट रूप में पता है, ये होवर्ड –एल फुटबाल गेम के वीकेंड में हुआ था/

डॉक्टर जॉन एन्करबर्ग:  फुटबाल गेम में/

डॉक्टर रवि जकर्याह:þ तो वो परेशान थे, पता नही था कि किस तरह प्रतिक्रिया होगी और नंबर दो, मैं पहली बार पाने पैरों पर खड़ा था, पिछले दो हफ्तों बाद, मैं स्कॉटलैंड में था कुछ रिसर्च कर रहा था, डेविड लिविंगस्टन पर, पीठ में चोट लगी, डिस्क हरनीएट हुई, मेरा शरीर इस तरह झुक गया था, ग्लासगो में 5 दिनों तक बिस्तर पर पडा रहा, वापस आया, मेरे एक टीममेट मुझे लेने के लिए आए थे, और मैं इतने समय तक बिस्तर पर लेटा था, उस दिन तक जब मुझे बोस्टन में आना था, कि इसे कर पाऊं, ये दो यादे बहुत अद्भुत हैं/ मुझे पता नही था कि ये किस तरह होगा/

लेकिन वही सवाल था और यही सवाल है/ इसे जवाब देने के दो तरीके हैं, थियोरी के रूप में, हाँ, लोग ऐसे जी सकते हैं कि मानो परमेश्वर अस्तित्व में नही है/ नास्तिक, एग्नोस्टिक, एथिस्थिक्स, कम से कम ज्यादा लोग ये करते हैं, व्यवहारी रूप में ये असम्भव है/ खासकर आप किसी भी बात पर नैतिकता की बात करना चाहते हैं/ यही परेशानी जॉन पॉल सार्ट की थी, यही परेशानी आगे जाकर एन्थनी फ्लू की भी थी, जैसे आप अच्छे से जानते हैं, ये इन्कोहरेन्स जैसे हम संसार में जीवन के सवालों के बारे में बुनियादी बातों को लाते हैं/ ये तथ्य के रूप में और संजोग से नही होगा/ जी, अस्तित्व के रूप में लोग इसे हटाना चाहेगे/ और जैसे तैसे जीवन जी लेगे/ लेकिन यदि आप अच्छा जीवन जीना चाहते हैं, और पीछा करनेवाले सवालों का जवाब देना चाहते हैं, तो परमेश्वर के बिना जीना असंभव है/ मैं सोचता हूँ कि ये ड्यूरांस की चुनौती थी, क्या हम ऐसे जिएगे जैसे मानो वो अस्त्तित्व में नही है? और यदि ये होता है तो हम किस तरह के गडबडी के संसार का सामना करेगे? और जैसे नीतची ने कहा, 20 वी सदी इतिहास में सबसे ज्यादा खून बहनेवाली होगी, क्योंकि परमेश्वर की मृत्यु की बात विख्यात हुई थी/ और ये ऐसा ही हुआ,पिछली 19 सदी के साथ जोड़ने से भी ज्यादा खून बहाया गया/

डॉक्टर जॉन एन्करबर्ग:  जी, मैंने ये दिलचस्प पाया है कि नितची के लेख ने हिटलर पर प्रभाव डाला, हिटलर ने उन्हें स्टॅलिन को दे दिया, और मुसोलिनी को/ और आप बता सकते हैं कि इन तीन देशों में क्या हुआ/

डॉक्टर रवि जकर्याह:þ जी, ये तो जानते हैं, यदि आप पॉल जॉनसन की किताब पढ़े, नाम है मॉडर्न टाइम्स, वो ये कहानी बताते हैं, वो इस तीन डेमागोग्स के बारे में कहते हैं, 1900 के मध्य के समय में, हिटलर, स्टालिन और मुसोलिनी, और सच तो ये है एक बार स्टालिन सेवकाई में जाने की तैयारी कर रहे थे, और प्रभु में विश्वास खो बैठे, हिटलर तो अवश्य ही सुपर रेस बनाना चाहते थे, अबर मैन, वो एक मजबूत मनुष्य बनाना चाहते थे, कि राज्य करे, और ये विचार कि परमेश्वर के बिना जीना बहुत विख्यात हो गया, नीतचे ने उस तरह से देखे तो, जो पास्टर के बेटे थे, और उनके दादा और नानी सेवकाई में थे/

और उन्होंने कहा कि जब हमने ये जाना कि परमेश्वर 19 वी सदी में मर गया, तो मानो पागलपन शुरू होगा, उनके जीवन के आखरी 13 साल, तो पागल हो गए, ठीक हुए, पागल हुए और हफ्तों तक चुप रहते थे/ लेकिन उन्होंने ये दृष्टांत दिया, उन्होंने कहा कि क्या आपने उस पागल आदमी के बारे में नही सुना, जो कंदील लेकर शहर में गया, और कहा मैं परमेश्वर को ढूड रहा हूँ, परमेश्वर कि ढूड रहा हूँ, उसने लोगों की हसी सुनकर सोचा कि वो नकल कर रहा है, और फिर उसने कहा परमेश्वर कहाँ चला गया, क्या हम उसे खो बैठे, क्या वो यात्रा पर चला गया, खो गया, और ये सवाल

लेकिन नीतचे के बारे में एक बात मुझे पसंद है, कि वो अपने निष्कर्ष के उपयोगिता के बारे में ईमानदार थे/ आधुनिक फिलोसोफर ये जहाँ जा रहा है उसे लेने के लिए तैयार नही होते हैं, नीतचे  ईमानदार थे, और उन्होंने इस तरह कहा, जिन शब्दों का उन्होंने उपयोग किया, किसने हमें क्षितिज को पोछने के लिए स्पन्च दिया है/ क्या कोई उतार चढाव रह गया है/ क्या दिए को सुबह के समय जलाना चाहिए/ हम कैसे उस सबसे महान उपलब्धी पा सकते हैं जो मनुष्य जाती के लिए सबसे बड़ी है/ कोई क्षितिज नही रहा, उसने जाना कि परमेश्वर की मृत्यु, का अर्थ है कि ये सटीकता की मृत्यु है और निश्चितता की मृत्यु है/

तो यहाँ ये सवाल था, हमें किस तरह का पवित्र खेल लाना होगा जिससे हम तृप्ति और किसी तरह से संतुष्टि को ला सके/ तो वो क्या कह रहे थे, किसी तरह की आत्मिकता बहुत जरूरी है/ कोई जो अद्भुत है, कोई जो सिद्ध स्वभाव का है/ अब हम ये सब कैसे पाएगे/

मेरे लिए ये जॉन, सच में, ये मेरे लिए हर समय का सबसे महान सवाल है/ यदि परमेश्वर किसी भी जगह पर नही है, तो हम परिभाषा कहाँ पाएगे, संपर्क की बात कहाँ पाएगे? नीतचे सही मुद्दे पर थे, तो उन्होंने कहा कि दो बातें होगी, 20 वी सदी इतिहास में सबसे खून भरी सदी होगी, क्योंकि 19 वी सदी ने परमेश्वर को मार दिया, फिलोसोफिक्ली कह रहे थे, और पुरे संसार में पागलपन कैसे होगा/

अवश्य ही हमें सलमत से बाहर आकर इन बातों को देखना होगा, कि आज हम इस संसार में कहाँ हैं? जब हम देखते हैं कि 20 वी सदी में क्या हुआ, अश्वेत और ये सारी बातें, जानते हैं लोग इन बातों को सुनना नही चाहते हैं, कहते हैं आप हद पार कर इसे खिंच रहे हैं, नही,  नही, जी के चेस्टरटन ने इसे  इस तरह रखा,परमेश्वर में विश्वास न करने की दू:ख की बात, ये ऐसा नही कि वो व्यक्ति किसी में विश्वास न करे, लेकिन ये इससे भी बुरा है, वो व्यक्ति किसी भी बात में विश्वास कर सकता है/

डॉक्टर जॉन एन्करबर्ग:  जी, और आपने कहा है कि चार मुश्किलें होगी, जब हम परमेश्वर की उपस्थिति को दूर करते हैं, परंपरा के जीवन से या किसी व्यक्ति के जीवन से/ और पहला तो आपने कहा है, और कोई नही था जिसके समझ के साथ बहस की हो, कि इन सवालों को बेहतर जवाब दे सके, तो पहला है यदि परमेश्वर अस्तित्व में नही है तो किसी नैतिक ढांचे के लिए कोई विवाद की बात नही है/

डॉक्टर रवि जकर्याह:þ जी, जन्म से मैं पुर्वीय हूँ औरयहाँ रहने से अब पश्चिमी हूँ, मैंने ये दोनों परंपरा अपना ली है, और मैं दोनों के बल और कमजोरियों को देखता हूँ, पश्चिमी संसार में हम सोचते हैं कि यदि पुर्वीय संसार में कोई परमेश्वर है, तो किस पर विश्वास करें, जानते हैं ये तनाव होते हैं, लेकिन सच्चाई तो ये है कि हमें नैतिक ढांचा चाहिए, जिससे हम अपना जीवन बना सके, अमेरिका में हम कानून की जड़ों के बारे में कहते हैं, ठीक है, हमारे पास कानून की जड़ है, राजनीति का तना है, और परंपरा की डालियाँ हैं, वो फैली हैं, किस कारण जड़ एक साथ रहेगी, ये तो नैतिक भूमि है, जिसे जड़ को एक साथ रखना होगा, उदाहरण के लिए अमेरिका सही क्रम में बना है/ और ये सबकुछ/ तो हम नैतिक बातों से कहा फिर गए,

यहाँ तक सबसे विख्यात नास्तिक ने भी इसे मान लिया है, ये तो केवल विख्यात होनेवाले हैं जो हर तरह के हल के साथ आना चाहते हैं, कुछ गलत शिक्षावाले जो सोचते हैं कि हम परमेश्वर से हटकर कुछ नैतिक बातों को ढूड निकालेगे/ वो गर्मजोशी से आते, पुराने और धोई गई थेयरी लाते हैं, जिनका कोई अर्थ नही होता है, मैकी, एक ऑस्ट्रेलियन ने कहा, जानते हैं, इन अच्छी या बुरी बातों के बारे में बातें करना मुश्किल है, जब तक कि किसी तरह का ढांचा न हो/ उन्होंने इसे माना/

काई निल्सन, कनेडियन नास्तिक ने कहा, व्यवहारिक रूप में हम किसी निर्णय लेने की बात पर नही आ सकते, चाहे हम कितने भी तथ्यों को एक साथ न जोड़ दे/ फिर उन्होंने ये कहा, ये तथ्य ही तो मुझे परेशान करते हैं, बर्टन रसल ने कहा कि वो सही और गलत के बिच का चुनाव उसी तरह करते हैं जैसे पीला और हरे में करते हैं, उन्होंने ये कोपोसटन से कहा और कोपोसटन ने कहा, हाँ तुम देखकर ही पीला और हरे में चुनाव करते हो, है ना? तो फिर भले और बुरे के बीच का फर्क महसूसीकरण के आधार पर करेगे, जी मैं अकसर अपने दर्शकों से कहता हूँ, कुछ परंपरा में वो पड़ोसियों से प्रेम करते हैं, दूसरी परंपरा में वो उन्हें मारते हैं, तो क्या बर्टन रसल के पास पर्याय था/

खैर बता दूँ कि नेतच ने खुद कहा था, कि आईने के हॉल में जो एक दुसरे की और प्रतिबिंब दिखाते हैं, वहां शब्दों का कोई अर्थ नही होता है/ उन्होंने कहा कि मैं इतना धर्मी हूँ जो सत्य की वेदी के सामने अपने घुटने टेक दूँ/ वो किस बारे में कह रहे थे, जो सत्य है उसके नैतिक उपयोग के बारे में/

और मेरे लिए जॉन, और मैं जानता हूँ आपके जीवन में भी, मैं एक परिवार की परवरिश कर रहा हूँ, मैं एक पिता हूँ, एक पती हूँ, अब मैं दादा भी हूँ/ और मैं देखता हूँ कि पढाई का क्षेत्र हमारे जवानों को कहाँ ले जा रहा है/ संबंधित होना, सम्बन्धित होने की सोच की चरम सीमा, तो मनो अपने पैरों को हवा में मजबूती से जमा देने जैसे है/ नैतिक निचित्ता की खोज किसी पारदर्शी बातों के बिना, तो इसे व्यवहारिक रूप में करना असंभव होगा/

डॉक्टर जॉन एन्करबर्ग:  हम अगले हफ्ते इस के बारे में और भी देखगे, क्योंकि ये बहुत महत्वपूर्ण बात हैं, लेकिन अब जो दो मिनट बाकि हैं, इसमें इसे जोड़ते हैं जो आप कह रहे हैं, जो आपके जीवन में हुआ है, लोग अर्थ ढूड रहे हैं, वो ढूड रहे हैं, जवाबों को और आपने इसे संसार में नही पाया, इसे आस्था में नही पाया/ आपने इसे एक व्यक्ति में पाया, इसके बारे में बताइए, और कैसे ये इस व्यक्ति यीशु मसीह ने उन चार सवालों का जवाब दिया, जिसके बारे में हम बात में चर्चा करेगे/

डॉक्टर रवि जकर्याह:þ जी, जब मुझे यू एन में वक्ता के रूप में बुलाया तो मुझे निश्चितता के बारे में कहने के लिए बताया गया, और मैंने यहाँ चार खोज के बार में बताया/ हमें खोजना है बुराई कि परिभाषा के बारे में, हमें न्याय के बारे में खोजना है, कैसे प्रेम की परिभाषा करे, और हम कब व्यवहारी रूप में माफ कर सकते हैं, बुराई, न्याय, प्रेम और माफी/ और वो ध्यान से सुन रहे थे, मैंने कहा अब मैं आप से एक सवाल पूछना चाहता हूँ, इतिहास में कहाँ ये चारों एक साथ आएं, किसी एक निश्चित समय में, ये एक साथ आए कलवरी नाम की पहाड़ी पर/ यीशु मसीह के व्यक्तित्व में, जिस में सिद्ध धार्मिकता प्रकट की गई, जिसमे परमेश्वर का प्रेम दिखाया गया, जिसने न्याय को क्रेंद्र में लाया, पाप के दण्ड में, और मुझे माफी दी/ और कही भी नही, और कही भी नही/ आप इन चार सच्चाई को एक साथ नही देखगे, और माफी और अनुग्रह दिया गया हो/ मैंने इसे यीशु मसीह में पाया है, और मुझे सुननेवाले दर्शकों को मैं यही बात बताता हूँ, यदि उसकी ओर देखेगे, उससे बातें करेगे, उससे प्रार्थना करेगे तो वो आपको अपनी क्षमा देगा/ और उसका छुटकारा भी/

डॉक्टर जॉन एन्करबर्ग:  जी, दोस्तों, ये अद्भुत बात है, और यदि आप इन बातों के बारे में सोच रहे हैं, और ज्यादा जानकारी पाना चाहते हैं, आप हमारी वेबसाइट पर जाइए, यहाँ आपके लिए एक जगह है कि यीशु मसीह से प्रार्थना करने के बारे में सोचते हैं, ऐसी प्रार्थना जो रवी ने पहले की थी, लेकिन शायद इसे करने से पहले आप और भी कुछ जानना चाहते हैं, तो आशा करता हूँ कि आप हमारे साथ बने रहेगे, और आनेवाले हफ्तों में हम चर्चा करेगे, मनुष्य परमेश्वर को खोजता है और वहां जो जवाब हैं उन्हें कुछ लोग नही ढूड पा रहे हैं, हम चाहेगे कि रवी इसमें मार्गदर्शन करें, इस गडबडी में, ये बर्बादी जो हो रही है, और आपको अगले हफ्ते सटीक उदाहरण दे, कि क्या मनुष्य परमेश्वर के बिना जी सकता है? आशा करता हूँ कि आप फिर जुड़ जाएगे/

 

 

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